भाव निर्मल हों तो जीवन का हर पल मंगल : आचार्य श्री सुनीलसागर जी
भाव निर्मल हों तो जीवन का हर पल मंगल : आचार्य श्री सुनीलसागर जी
भाव निर्मल हों तो जीवन का हर पल मंगल : आचार्य श्री सुनीलसागर जी
इंदौर। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन)। नेमी नगर जैन कॉलोनी में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में आचार्य श्री 108 सुनीलसागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन की वास्तविक दिशा हमारे भावों से तय होती है। उन्होंने कहा, “भाव निर्मल हैं तो हर पल मंगल है, भाव मैले हैं तो हर पल दंगल है।”
आचार्य श्री ने कहा कि संसार की सुख-सुविधाओं से जीवन कितना ही संपन्न क्यों न हो, लेकिन धर्म और ध्यान के बिना जीवन अधूरा रहता है। आत्मज्ञान के अभाव में मनुष्य का जीवन जंगल के समान भटकता रहता है। केवल बाहरी परिस्थितियों को बदलने से जीवन नहीं बदलता, बल्कि अपने भावों को निर्मल और श्रेष्ठ बनाना आवश्यक है। भाव सुधरेंगे तभी भावावली सुधरेगी और भावावली के सुधरने से जीवन को मुक्ति की दिशा प्राप्त होगी।
उन्होंने दांपत्य जीवन के 50 वर्ष पूर्ण करने वाले दंपती का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे महत्वपूर्ण अवसरों को केवल सांसारिक उत्सव तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें धर्म और परोपकार से जोड़ना चाहिए। विवाह की 50वीं वर्षगांठ पर भव्य आयोजन या पुनः विवाह करने के बजाय ऐसे श्रावकों को तीर्थयात्रा करवानी चाहिए, जो स्वयं तीर्थ यात्रा करने में सक्षम नहीं हैं। शिखरजी और गिरनारजी जैसे पवित्र तीर्थों की यात्रा करवाकर इस अवसर को आत्मकल्याण और परोपकार का माध्यम बनाया जा सकता है।
आचार्य श्री ने कहा कि अब तक हमने संसार को पसंद किया, सांसारिक वस्तुओं और सांसारिक लोगों को प्राथमिकता दी, इसलिए हमें संसार ही प्राप्त हुआ। यदि आज से हम अरिहंतों और सिद्धों को पसंद करना तथा मुनियों की चर्या और साधना को अपनाना शुरू कर दें, तो जीवन में कभी न कभी उसी दिशा की उपलब्धि अवश्य हो सकती है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि जीवन के महत्वपूर्ण अवसर केवल उत्सव मनाने तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें धर्म, परोपकार और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर बनाया जाए। आचार्य श्री के प्रेरणादायी उद्बोधन से उपस्थित श्रद्धालुओं ने जीवन में अपने भावों को निर्मल बनाने तथा धर्ममय जीवन अपनाने का संकल्प लिया।





