जब धर्म बना श्रृंगार, त्याग बना संस्कार—रावतभाटा में दिखी पर्युषण की अनुपम तस्वीर
जब धर्म बना श्रृंगार, त्याग बना संस्कार—रावतभाटा में दिखी पर्युषण की अनुपम तस्वीर

जब धर्म बना श्रृंगार, त्याग बना संस्कार—रावतभाटा में दिखी पर्युषण की अनुपम तस्वीर
बच्चियों से लेकर महिलाओं तक ने किया लिपिस्टिक और सौंदर्य प्रसाधनों का त्याग, पर्वराज पर्युषण की मर्यादा ने दिया समाज को बड़ा संदेश
रावतभाटा। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन)।
न श्रृंगार की चाह, न सौंदर्य प्रसाधनों का आकर्षण… चेहरे पर सादगी, मन में भक्ति और आचरण में संयम। रावतभाटा में दशलक्षण महापर्व के दौरान ऐसा अद्भुत दृश्य देखने को मिला, जिसने धर्म और संस्कारों की गहरी छाप छोड़ दी। पर्वराज पर्युषण की धार्मिक भावना को आत्मसात करते हुए कार्यक्रम में शामिल छोटी-छोटी बच्चियों से लेकर महिलाओं तक ने लिपिस्टिक सहित विभिन्न सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग नहीं किया।
यह केवल सौंदर्य प्रसाधनों का त्याग नहीं था, बल्कि धर्म के लिए अपनी व्यक्तिगत पसंद और आकर्षण को पीछे छोड़ने की भावना का जीवंत उदाहरण था। आधुनिकता के दौर में जब बाहरी सुंदरता को विशेष महत्व दिया जाता है, वहीं इन बच्चियों और महिलाओं ने यह संदेश दिया कि सबसे बड़ा श्रृंगार चेहरे का नहीं, चरित्र और संस्कारों का होता है।
छोटी उम्र में बड़ा संस्कार
विशेष रूप से बच्चियों का यह त्याग उपस्थित लोगों के लिए भावुक कर देने वाला रहा। जिन हाथों में उम्र के इस पड़ाव पर सजने-संवरने की स्वाभाविक इच्छा हो सकती है, उन्हीं हाथों ने धर्म की मर्यादा को स्वीकार करते हुए सौंदर्य प्रसाधनों से दूरी बनाई। उनके इस संस्कार ने यह विश्वास जगाया कि धर्म की शिक्षा जब बचपन से जीवन में उतरती है, तो आने वाली पीढ़ियां संस्कारों की मजबूत नींव बनती हैं।
दशलक्षण महापर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण, संयम, त्याग और आत्मशुद्धि की साधना का अवसर है। ऐसे में बाहरी आकर्षणों से स्वयं को दूर रखना पर्व की भावना को जीवन में उतारने का महत्वपूर्ण माध्यम बन जाता है।
बाहरी सुंदरता नहीं, आत्मा का श्रृंगार बने जीवन का लक्ष्य
रावतभाटा में दिखाई दी यह तस्वीर समाज के सामने एक गंभीर संदेश भी छोड़ गई—यदि धर्म के लिए हम छोटी-छोटी इच्छाओं का त्याग करना सीख लें, तो यही त्याग धीरे-धीरे आत्मसंयम और आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।
पर्युषण हमें सिखाता है कि जीवन का वास्तविक सौंदर्य बाहरी प्रसाधनों में नहीं, बल्कि सत्य, संयम, करुणा, त्याग और शुद्ध आचरण में है। इसी भावना को इन बच्चियों और महिलाओं ने अपने आचरण से चरितार्थ किया।
रावतभाटा में दशलक्षण पर्व के दौरान सामने आई यह तस्वीर केवल एक कार्यक्रम की तस्वीर नहीं, बल्कि धर्म की उस शक्ति का प्रमाण है, जो आधुनिक जीवन के बीच भी त्याग, मर्यादा और संस्कारों को जीवंत रख सकती है।
यही है पर्वराज पर्युषण की सच्ची प्रेरणा—
श्रृंगार कम हो तो चलेगा, संस्कार कम नहीं होने चाहिए।
सुविधाएं छूट जाएं तो चलेगा, धर्म की मर्यादा नहीं छूटनी चाहिए।
और बाहरी सौंदर्य क्षणिक है, लेकिन त्याग और संस्कार जीवनभर की पहचान बन जाते हैं।




