आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज ने दिया जीवों के प्रति करुणा और अहिंसा का संदेश.दसलक्षण पर्व के छठे दिन उत्तम संयम धर्म की आराधना
आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज ने दिया जीवों के प्रति करुणा और अहिंसा का संदेश.दसलक्षण पर्व के छठे दिन उत्तम संयम धर्म की आराधना

आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज ने दिया जीवों के प्रति करुणा और अहिंसा का संदेश.दसलक्षण पर्व के छठे दिन उत्तम संयम धर्म की आराधना
बड़ौत। (संवाददाता मुकेश जैन)। दसलक्षण पर्व के छठे दिन उत्तम संयम धर्म की आराधना श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक वातावरण में की जा रही है। इस पावन अवसर पर आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज ने उत्तम संयम धर्म का संदेश देते हुए कहा कि राग-द्वेष से रहित होकर प्रत्येक जीव के प्रति करुणा रखना ही सच्चे संयम की पहचान है।
जैन दर्शन में उत्तम संयम धर्म का विशेष महत्व बताया गया है। संयम केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मन, वचन और काया को नियंत्रित करते हुए सभी जीवों के प्रति दया, करुणा और मैत्रीभाव रखने की प्रेरणा देता है। राग-द्वेष का त्याग, अहिंसा का पालन तथा अनावश्यक क्रियाओं से बचना संयमित जीवन के महत्वपूर्ण अंग हैं।
आचार्य श्री के संदेश के अनुसार, प्रत्येक साधक को त्रस एवं स्थावर जीवों की हिंसा से बचते हुए अपने जीवन में शुभ भावों को स्थान देना चाहिए। आवश्यक धार्मिक क्रियाओं का नियमित पालन करते हुए बिना प्रयोजन किसी भी कार्य में प्रवृत्त नहीं होना चाहिए तथा चित्त को शुभ ध्यान में लगाना चाहिए।
संयमित जीवन से आत्मकल्याण का मार्ग
दसलक्षण पर्व आत्मशुद्धि, तप, त्याग और धर्म साधना का पावन अवसर है। उत्तम संयम धर्म मनुष्य को अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण रखने, दूसरों के प्रति संवेदनशील बनने तथा अहिंसामय जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
इस अवसर पर प्रस्तुत धर्मभावना की पंक्तियां संयम का सुंदर संदेश देती हैं—
“महामुनीश्वर सब जीवों पर, करुणामय शुभ-भाव धरें।
त्रस, थावर हिंसा से विरहित, राग-द्वेष परिहार करें।
सर्व प्रशंसित आवश्यक वे, संयमित होकर नित्य करें।
बिना प्रयोजन क्रिया नहीं हो, शुभ ध्यानों में चित्त धरें॥”
दसलक्षण पर्व के छठे दिन उत्तम संयम धर्म की आराधना के माध्यम से श्रद्धालुओं को अहिंसा, करुणा, आत्मनियंत्रण और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिल रही है।




