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विशाल संघ के नायक आचार्य श्री सुनील सागरजी के सान्निध्य में संयम की ओर बढ़े कदम, सुलब्धिसागरजी ने ग्रहण किया संथारा
नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन )
परमपूज्य चर्याचक्रवर्ती प्राकृताचार्य श्री सुनीलसागरजी गुरुदेव ससंघ का नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर में वर्षावास चल रहा है। इसी पावन अवसर पर इंदौर निवासी श्री नरेंद्रजी जैन (पथरिया) ने पूज्य गुरुदेव के चरणों में अंतिम सल्लेखना एवं समाधिमरण की भावना प्रकट की। उनके परिजनों ने भी उनकी इस धार्मिक भावना में सहमति प्रदान की।
11 अगस्त 2026, मंगलवार को चतुर्दशी के पावन अवसर पर दोपहर 4 बजे पूज्य गुरुदेव ने श्री नरेंद्रजी जैन की शारीरिक स्थिति को देखते हुए उन्हें क्षुल्लक व्रत प्रदान किए तथा 11 प्रतिमा के संस्कार कराए। लंबे समय से अस्वस्थता से जूझ रहे श्री नरेंद्रजी जैन को गुरु सान्निध्य एवं मार्गदर्शन प्राप्त होने के बाद उनके परिणामों में शांति, सहजता और धर्म के प्रति विशेष भाव दिखाई दे रहे हैं।
यह सौभाग्य अत्यंत पुण्य और शुभ परिणामों से प्राप्त होता है कि जीवन के अंतिम पड़ाव में विशाल संघ का सान्निध्य एवं चर्याचक्रवर्ती आचार्य भगवंत का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन प्राप्त हो। श्री नरेंद्रजी जैन को भी यह विशेष सौभाग्य प्राप्त हुआ।
इसी भाव को देखते हुए आचार्य भगवंत ने उनका नाम “सुलब्धिसागर” रखा। ‘लब्धि’ का अर्थ होता है—प्राप्त करना, अर्थात जो जीवन में दुर्लभ अवसरों एवं धर्मलाभ को प्राप्त करने वाला हो। गुरु चरणों में प्राप्त यह नाम उनके लिए धर्म, संयम और आत्मकल्याण की भावना का प्रतीक बना।
पूज्य आचार्य भगवंत के मार्गदर्शन में उन्होंने जीवन के अंतिम पड़ाव को धर्म, संयम, वैराग्य और समता की भावना के साथ स्वीकार करते हुए सल्लेखना का संकल्प ग्रहण किया। गुरु सान्निध्य में प्राप्त यह अवसर जैन धर्म की उस महान भावना को दर्शाता है, जिसमें जीवन के अंतिम समय में भी आत्मा के कल्याण, कषायों की शांति और समता भाव को सर्वोपरि माना जाता है।
गुरु चरणों में सल्लेखना का यह संकल्प आत्मकल्याण की दिशा में बढ़ता एक भावपूर्ण एवं प्रेरणादायी कदम है।
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