व्रत, संयम और श्रद्धा से मिलता है जीवन में पुण्य का संबल : रोट तीज चौबीसी व्रत की प्रेरक कथा
व्रत, संयम और श्रद्धा से मिलता है जीवन में पुण्य का संबल : रोट तीज चौबीसी व्रत की प्रेरक कथा
व्रत, संयम और श्रद्धा से मिलता है जीवन में पुण्य का संबल : रोट तीज चौबीसी व्रत की प्रेरक कथा
(संवाददाता मुकेश कुमार जैन)। जैन धर्म में रोट तीज चौबीसी व्रत को श्रद्धा, संयम, तप, स्वाध्याय और आत्मशुद्धि से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक व्रत माना गया है। उज्जैन नगरी से संबंधित इसकी प्रेरक कथा श्रद्धालुओं को धर्म में लिए गए संकल्प को दृढ़ता से निभाने तथा विपरीत परिस्थितियों में भी आस्था बनाए रखने का संदेश देती है।
धार्मिक कथा के अनुसार उज्जैन में सागरदत्त नामक सेठ अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्री के साथ रहते थे। एक दिन सेठानी ने जिनमंदिर में जाकर रोट तीज चौबीसी व्रत का नियम लिया। यह व्रत परंपरा के अनुसार 3 वर्ष, 12 वर्ष अथवा 24 वर्ष के लिए लिया जाता है। व्रत के साथ देव दर्शन, देव पूजा, गुरु सेवा, स्वाध्याय, संयम-तप और ध्यान जैसे धार्मिक कर्तव्यों का पालन किया जाता है।
सेठानी ने घर पहुंचकर परिवार को अपने व्रत के नियम की जानकारी दी, लेकिन परिवार के सदस्यों ने उनका उपहास किया। इससे वह अपने संकल्प पर दृढ़ नहीं रह सकीं और व्रत खंडित हो गया। कथा के अनुसार इसके परिणामस्वरूप परिवार का वैभव, संपदा और रत्न आदि नष्ट हो गए।
इसके बाद परिवार के सोलह प्राणी हस्तिनापुर में अपनी बेटी के घर पहुंचे। बेटी ने उन्हें अपने घर में आश्रय नहीं दिया, लेकिन एक समय के भोजन की थाली पांच रत्नों के साथ भेजी। जैसे ही सेठानी ने थाली हाथ में ली, भोजन मिट्टी और रत्न कोयले में परिवर्तित हो गए। इस घटना ने परिवार को व्रत की महत्ता और अपने धर्म-संकल्प की गंभीरता का अहसास कराया।
इसके बाद सागरदत्त अपने ससुराल पहुंचे, लेकिन वहां भी उन्हें तिरस्कार का सामना करना पड़ा और भोजन तक नहीं मिला। इसी दौरान पुण्य के उदय से उन्हें मित्र के माध्यम से रोट प्राप्त हुए। मुनिराज की प्रेरणा से उन्होंने रोट जिनालय में अर्पित किए और पुनः श्रद्धापूर्वक व्रत का पालन प्रारंभ किया।
कथा के अनुसार व्रत की श्रद्धा, संयम, तप और धार्मिक आचरण के प्रभाव से परिवार की खोई हुई संपदा पुनः प्राप्त हो गई। इस प्रकार रोट तीज चौबीसी व्रत की कथा धर्म में दृढ़ आस्था और संकल्प की शक्ति को उजागर करती है।
आत्मशुद्धि और संयम का संदेश
रोट तीज चौबीसी व्रत का उद्देश्य केवल सांसारिक सुख-समृद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मसंयम, त्याग, तप, स्वाध्याय और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ना है। जैन दर्शन में व्रत आत्मा को कर्मबंधनों से मुक्त करने की साधना का महत्वपूर्ण माध्यम है।
यह व्रत श्रद्धालुओं को प्रेरणा देता है कि धर्म में लिया गया संकल्प किसी के उपहास, मोह या विपरीत परिस्थिति के कारण कमजोर नहीं पड़ना चाहिए। श्रद्धा के साथ नियम का पालन, संयमित जीवन और आत्मचिंतन ही व्रत की वास्तविक साधना है। रोट तीज चौबीसी व्रत इसी धार्मिक चेतना को जीवन में उतारने का संदेश देता है।





