लोभ और तृष्णा का त्याग ही आत्मा की सच्ची शुचिता, संतोष से मिलता है परम सुख
लोभ और तृष्णा का त्याग ही आत्मा की सच्ची शुचिता, संतोष से मिलता है परम सुख

दशलक्षण महापर्व के चतुर्थ दिवस गूंजा उत्तम शौच धर्म का संदेश
लोभ और तृष्णा का त्याग ही आत्मा की सच्ची शुचिता, संतोष से मिलता है परम सुख
इंदौर। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन)।
श्री दिगंबर जैन समाज नेमी नगर (जैन कॉलोनी, इंदौर) में इंद्रपुरी चातुर्मास उत्सव 2026 के अंतर्गत दशलक्षण महापर्व का चतुर्थ दिवस श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना के साथ उत्तम शौच धर्म को समर्पित रहा। धर्ममय वातावरण में श्रद्धालुओं ने उत्तम शौच धर्म के स्वरूप को आत्मसात करते हुए आत्मशुद्धि एवं संयम की ओर बढ़ने का भाव व्यक्त किया।
लोभ से अशांत, संतोष से शांत होता है मन
उत्तम शौच धर्म का मूल संदेश मन की वास्तविक शुद्धि से जुड़ा है। मनुष्य बाहरी रूप से कितना ही संपन्न क्यों न हो, यदि उसके भीतर लोभ, लालच और तृष्णा का भाव विद्यमान है तो उसे वास्तविक शांति प्राप्त नहीं हो सकती। जब मनुष्य लोभ का त्याग कर संतोष को अपनाता है, तभी उसके जीवन में आंतरिक पवित्रता और आत्मिक शांति का उदय होता है।
दशलक्षण महापर्व आत्मा को विकारों से मुक्त करने और अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान कराने वाला महान आध्यात्मिक पर्व है। उत्तम शौच धर्म हमें यह प्रेरणा देता है कि संसार की भौतिक वस्तुओं के पीछे अनंत दौड़ लगाने के बजाय अपने भीतर झांकें और मन में उत्पन्न होने वाली तृष्णा को शांत करें।
संतोष ही आत्मिक संपदा
धार्मिक चिंतन में बताया गया कि मनुष्य की इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। यही तृष्णा धीरे-धीरे लोभ का रूप धारण कर मन की शांति को भंग करती है। इसके विपरीत संतोष का भाव व्यक्ति को भीतर से समृद्ध बनाता है।
उत्तम शौच धर्म का संदेश है—मन को निर्मल बनाइए, लोभ को छोड़िए और संतोष को जीवन का आधार बनाइए। जब भावों की शुद्धि होती है, तभी आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप की ओर अग्रसर होती है।
धर्माराधना से वातावरण हुआ भक्तिमय
दशलक्षण महापर्व के चतुर्थ दिवस समाजजनों में विशेष धार्मिक उत्साह दिखाई दिया। श्रद्धालुओं ने भक्ति एवं श्रद्धा के साथ धर्माराधना करते हुए आत्मचिंतन किया। उत्तम शौच धर्म के माध्यम से जीवन में संयम, संतोष, त्याग और पवित्र भावनाओं को अपनाने की प्रेरणा मिली।
इस अवसर पर यह भाव भी प्रमुखता से उभरा कि सच्चा धन बाहरी संपत्ति नहीं, बल्कि निर्मल मन और संतोषी जीवन है। मन से लोभ और तृष्णा का त्याग होने पर ही आत्मा की शुचिता का मार्ग प्रशस्त होता है।
आध्यात्मिक संदेश
“जहां लोभ समाप्त होता है, वहीं संतोष का जन्म होता है;
जहां संतोष आता है, वहीं मन को शांति मिलती है;
और जहां मन निर्मल होता है, वहीं आत्मा का मंगल मार्ग प्रशस्त होता है।”
श्री दिगंबर जैन समाज नेमी नगर (जैन कॉलोनी, इंदौर)
इंद्रपुरी चातुर्मास उत्सव 2026
समर्पित — श्री सुनील सागर युवा संघ, भारत




