दसलक्षण महापर्व के तृतीय दिवस उत्तम आर्जव धर्म की महत्ता बताई अपकार करने वाले का भी उपकार करना चाहिए — आचार्य श्री आर्जवसागर जी
दसलक्षण महापर्व के तृतीय दिवस उत्तम आर्जव धर्म की महत्ता बताई अपकार करने वाले का भी उपकार करना चाहिए — आचार्य श्री आर्जवसागर जी

दसलक्षण महापर्व के तृतीय दिवस उत्तम आर्जव धर्म की महत्ता बताई अपकार करने वाले का भी उपकार करना चाहिए — आचार्य श्री आर्जवसागर जी
बड़ौत। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन)। दसलक्षण महापर्व आचार्य श्री 108 आर्जवसागर जी महामुनिराज ससंघ के पावन सान्निध्य में श्रद्धा, भक्ति एवं धार्मिक उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। महापर्व के तृतीय दिवस उत्तम आर्जव धर्म पर मंगल प्रवचन करते हुए आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज ने कहा कि “हमें अपकार करने वाले का भी उपकार ही करना चाहिए।”
आचार्य श्री ने कहा कि वीतराग भगवान का ध्यान मन की निर्मलता का कारण बनता है। आर्जव का अर्थ है ऋजुता अर्थात सरलता। माया का अभाव ही आर्जव धर्म है। जब जीवन से छल, कपट, बेईमानी एवं मायाचार का भाव समाप्त होता है, तब उत्तम आर्जव धर्म प्रकट होता है। चार कषायों के क्षय एवं उपशम के क्रम में संबंधित धर्मों की अभिव्यक्ति होती है, इसलिए माया कषाय से विमुक्ति आर्जव धर्म की साधना का महत्वपूर्ण आधार है।
उन्होंने कहा कि मन, वचन और काया की क्रियाएं निरंतर चलती रहती हैं। इन तीनों योगों की क्रिया सरल, सहज और निष्कपट होनी चाहिए। मन में किसी के प्रति वक्र चिंतन न हो, वाणी में छल-कपट न हो और व्यवहार में किसी को गुमराह करने की भावना न हो। मन, वचन और काया को सरल बनाकर स्व एवं पर के हित की भावना रखना ही आर्जव धर्म का वास्तविक स्वरूप है।
आचार्य श्री ने कहा कि हमारी क्रियाओं से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारे मन में क्या चल रहा है। इसलिए आर्जव धर्म के पालन के लिए तीनों योगों में अवक्रता और सरलता आवश्यक है। जो व्यक्ति वक्र चिंतन नहीं करता, वक्र वचन नहीं बोलता तथा वक्रता से कार्य नहीं करता, उसके जीवन में आर्जव धर्म प्रकट होता है।उन्होंने आत्मशुद्धि के लिए अपने दोषों को छिपाने के बजाय उन्हें भगवान एवं गुरु के समक्ष स्वीकार करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि गुरु के सामने अपने दोषों को स्पष्ट रूप से रखना चाहिए। गुरु द्वारा दिए गए प्रायश्चित के माध्यम से व्यक्ति अपने पाप कर्मों के क्षय की दिशा में आगे बढ़ सकता है और आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
आचार्य श्री ने कहा कि आजकल व्यक्ति ख्याति, लाभ, पूजा और मान-सम्मान के मोह में अपने ही लोगों को ठुकरा देता है। इसका कारण कहीं न कहीं श्रद्धा की कमी है। पुण्य-पाप और देव-शास्त्र-गुरु के प्रति जिसकी श्रद्धा दृढ़ नहीं होती, वह जीवन में वास्तविक श्रेष्ठता प्राप्त नहीं कर सकता। जैसे-जैसे श्रद्धा बढ़ती है, वैसे-वैसे भगवान के स्वरूप की समझ विकसित होती है और देव, शास्त्र एवं गुरु के प्रति विश्वास दृढ़ होता जाता है।
उन्होंने मायाचार के दुष्परिणाम बताते हुए कहा कि मायाचारी जीव को कर्मों के बंधन के कारण अगले भव में तिर्यंच गति सहित विभिन्न प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए जीवन में सरलता, निष्कपटता और सत्यनिष्ठा को अपनाना आवश्यक है।
आचार्य श्री ने कहा कि अपने सुख के लिए दूसरों के दुख की उपेक्षा करना भी बहुत बड़ी भूल है और आर्जव धर्म के विपरीत है। हमें कभी किसी को धोखा नहीं देना चाहिए, किसी के साथ छल-कपट नहीं करना चाहिए तथा अपने भीतर सरलता एवं निष्कपटता के भावों को विकसित करना चाहिए।
दसलक्षण महापर्व के इस पावन अवसर पर श्रद्धालुजन बड़ी भक्ति एवं उत्साह के साथ भगवान की आराधना कर रहे हैं तथा आचार्य श्री के मंगल प्रवचनों से धर्मलाभ प्राप्त कर रहे |




