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भावों की दिशा तय करती है आत्मा की मंज़िल — आचार्य श्री सुनीलसागर 

भावों की दिशा तय करती है आत्मा की मंज़िल — आचार्य श्री सुनीलसागर 

भावों की दिशा तय करती है आत्मा की मंज़िल — आचार्य श्री सुनीलसागर

 

नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर। (संवाददाता : मुकेश कुमार जैन)

 

इंदौर। सन्मति समोशरण में परम पूज्य आचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में आत्मा के उत्थान और जीवन में भावों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दुनिया जैसी है, उसे वैसी ही रहने दीजिए। कुछ पल के लिए बाहर की परिस्थितियों को बदलने के बजाय अपने भीतर के भावों को बदलकर देखिए। क्योंकि जब भाव बदलते हैं तो दृष्टि बदलती है, दृष्टि बदलने से आचरण बदलता है और धीरे-धीरे जीवन की दिशा भी बदल जाती है।

 

आचार्य श्री ने कहा कि पंच परावर्तन में सबसे महत्वपूर्ण भाव परावर्तन है। मनुष्य के भीतर भाव न हों, ऐसा संभव नहीं है। प्रत्येक जीव के अंदर किसी न किसी प्रकार के भाव निरंतर प्रवाहित होते रहते हैं। किसी के भीतर क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों के भाव होते हैं, तो किसी के भीतर विषय-वासनाओं के भाव। वहीं सौभाग्यशाली वे जीव हैं, जिनके भीतर पूजा, आराधना, धर्म, ध्यान और आत्मकल्याण के भाव जागृत होते हैं।

 

उन्होंने कहा कि केवल भावों का होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह देखना भी आवश्यक है कि हमारे भाव किस दिशा में जा रहे हैं। अशुद्ध भाव आत्मा को संसार की ओर ले जाते हैं, जबकि शुद्ध भाव आत्मा को परमात्मा बनने की दिशा में आगे बढ़ाते हैं।

 

आचार्य श्री ने प्रेरणा देते हुए कहा कि संसार को बदलने की चिंता छोड़कर एक बार अपने भीतर झांककर देखिए कि मेरे भाव किस दिशा में जा रहे हैं? यदि भावों की दिशा सही हो गई तो जीवन की दिशा स्वतः बदल जाएगी।

 

उन्होंने कहा कि जिस दिन भावों में परिवर्तन प्रारंभ हो जाता है, उसी दिन आत्मा के परिवर्तन की शुरुआत हो जाती है। यही आंतरिक परिवर्तन एक दिन जीव को संसारी अवस्था से सिद्ध अवस्था और आत्मा से परमात्मा बनने की दिशा में ले जाता है।

 

संदेश स्पष्ट है—बाहर की दुनिया को बदलने से पहले अपने भीतर के भावों को बदलें, क्योंकि भावों की दिशा ही आत्मा की मंज़िल तय करती है।

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