मंदिर में ही नहीं, हर जगह है प्रभु की उपस्थिति : आचार्य श्री सुनीलसागरजी
मंदिर में ही नहीं, हर जगह है प्रभु की उपस्थिति : आचार्य श्री सुनीलसागरजी

मंदिर में ही नहीं, हर जगह है प्रभु की उपस्थिति : आचार्य श्री सुनीलसागरजी
इंदौर। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन)। नेमी नगर जैन कॉलोनी में प्रवचन के दौरान आचार्य श्री सुनीलसागरजी गुरुदेव ने कहा कि धर्मस्थलों पर श्रद्धा से शीश झुकाना तभी सार्थक है, जब उसका प्रभाव मनुष्य के विचार, वाणी और व्यवहार में भी दिखाई दे। केवल मंदिर में पूजा-अर्चना करना ही धर्म नहीं, बल्कि धर्मस्थल से बाहर निकलकर सदाचारपूर्ण जीवन जीना सच्ची धार्मिकता है।
उन्होंने कहा कि लोग मंदिर में पाप करने, मस्जिद में गलत कार्य करने, गुरुद्वारे में किसी को कष्ट देने और चर्च में किसी को गाली देने से बचते हैं, लेकिन धर्मस्थल से बाहर आते ही अपने कर्मों के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। यह मनुष्य की बड़ी भूल है।
आचार्यश्री ने कहा कि प्रभु की उपस्थिति केवल मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या चर्च तक सीमित नहीं है। मनुष्य चाहे अपने कर्मों को कितना ही छिपाने का प्रयास करे, कर्मों का फल उससे नहीं छिप सकता। जिस प्रकार छिपकर कोयला खाने पर मुंह काला होना निश्चित है, उसी प्रकार किए गए कर्मों का परिणाम भी अवश्य भोगना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि धर्मस्थल धर्म, संस्कार और सदाचार की पाठशाला हैं। वहां प्राप्त ज्ञान की वास्तविक परीक्षा धर्मस्थल की चौखट के भीतर नहीं, बल्कि बाहर जीवन के व्यवहार में होती है। इसलिए पूजा के साथ अपने आचरण को भी पवित्र बनाएं और विचार, वाणी तथा व्यवहार में धर्म को
उतारें।




