फैशन रोज बदलता है, चेहरे भी बदलते हैं, लेकिन आत्मा को संवारने वाला ही वास्तव में निखरता है : आचार्य श्री सुनीलसागरजी
फैशन रोज बदलता है, चेहरे भी बदलते हैं, लेकिन आत्मा को संवारने वाला ही वास्तव में निखरता है : आचार्य श्री सुनीलसागरजी

फैशन रोज बदलता है, चेहरे भी बदलते हैं, लेकिन आत्मा को संवारने वाला ही वास्तव में निखरता है : आचार्य श्री सुनीलसागरजी
नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन)। परम पूज्य आचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी महाराज ने प्रवचन में मनुष्य को बाहरी आकर्षण के बजाय आत्मिक सौंदर्य को निखारने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि संसार में फैशन रोज बदलता है और समय के साथ मनुष्य का चेहरा भी बदलता रहता है। फैशन का बदलना तो हमें प्रतिदिन दिखाई देता है, लेकिन चेहरे में होने वाला परिवर्तन रोज महसूस नहीं होता। वर्षों बाद जब मनुष्य पीछे मुड़कर देखता है, तब उसे अपने बदलते स्वरूप का एहसास होता है।
आचार्यश्री ने कहा कि बाहरी रूप को सजाने-संवारने की अपेक्षा मनुष्य को अपनी आत्मा को संवारने का पुरुषार्थ करना चाहिए। प्रतिदिन अपने भीतर सद्गुणों का विकास करने वाला व्यक्ति ही वास्तविक अर्थों में निखरता है। उसके भीतर का परिवर्तन उसके आचरण, विचार और व्यक्तित्व में स्वतः दिखाई देने लगता है।
उन्होंने कहा, “ज्ञायक का स्वभाव करो।” आत्मा के ज्ञाता स्वरूप को पहचानना और उसी में रमने का प्रयास ही वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा है। जब मनुष्य बाहरी दुनिया को बदलने के बजाय अपने भीतर की सृष्टि को बदलने का पुरुषार्थ करता है, तब वह धीरे-धीरे अपने जीवन का मूलनायक बन जाता है।
आचार्यश्री ने कहा कि बाहरी परिवर्तन समय के साथ अपने आप होते रहते हैं, लेकिन आत्मिक परिवर्तन जागरूकता, साधना और पुरुषार्थ से होता है। इसलिए क्षणिक आकर्षण के पीछे भागने के बजाय मनुष्य को अपने भीतर के गुणों, विचारों और आत्मस्वरूप को निखारने पर ध्यान देना चाहिए। यही वास्तविक सौंदर्य है और यही जीवन की सार्थकता है।



