आचार्य श्री सुनीलसागर जी ने कराया आत्मस्वरूप का बोध, कहा—वस्तुओं का नहीं, आसक्ति का त्याग ही सच्चा आकिंचन्य
आचार्य श्री सुनीलसागर जी ने कराया आत्मस्वरूप का बोध, कहा—वस्तुओं का नहीं, आसक्ति का त्याग ही सच्चा आकिंचन्य

उत्तम आकिंचन्य धर्म ने दिया ‘मेरेपन’ के त्याग का संदेश
आचार्य श्री सुनीलसागर जी ने कराया आत्मस्वरूप का बोध, कहा—वस्तुओं का नहीं, आसक्ति का त्याग ही सच्चा आकिंचन्य
इंदौर। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन)।
दशलक्षण महापर्व के नवें दिन नेमी नगर जैन कॉलोनी में उत्तम आकिंचन्य धर्म की आराधना श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ संपन्न हुई। इस अवसर पर मुनि कुंजर ज्येष्ठाचार्य आदिसागर जी अंकलीकर परंपरा के चतुर्थ पट्टाधीश राष्ट्रगौरव आचार्य श्री 108 सुनीलसागर जी महाराज ने उत्तम आकिंचन्य धर्म के गूढ़ आध्यात्मिक स्वरूप पर मंगल प्रवचन देते हुए श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, आत्मजागरण एवं ममत्व के त्याग की प्रेरणा दी।
आचार्य श्री ने कहा कि आकिंचन्य का अर्थ केवल बाहरी वस्तुओं का त्याग करना नहीं, बल्कि भीतर से ‘यह मेरा है’ के भाव का विसर्जन करना है। मनुष्य घर, धन, पद, प्रतिष्ठा और अन्य सांसारिक वस्तुओं का त्याग कर दे, लेकिन यदि उनके प्रति मन में ममत्व और आसक्ति बनी रहे तो वास्तविक आकिंचन्य प्रकट नहीं होता।
उन्होंने आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि आत्मा स्वयं अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन और आनंद से परिपूर्ण है। इसलिए बाहरी वस्तुओं में सुख तलाशने के बजाय अपने भीतर स्थित शुद्ध आत्मस्वरूप को पहचानना ही उत्तम आकिंचन्य धर्म की वास्तविक साधना है।
गुरुदेव ने कहा कि “मेरा घर, मेरा धन, मेरा पद, मेरा सम्मान” जैसे भाव ही मनुष्य को परिग्रह और मोह के बंधन में बांधते हैं। जैसे-जैसे ‘मेरा’ कम होता जाता है, वैसे-वैसे आत्मा की स्वतंत्रता और शांति का अनुभव बढ़ता है। उत्तम आकिंचन्य हमें संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए वस्तुओं के प्रति आसक्ति और ममत्व से मुक्त होना सिखाता है।
मंगलाचरण से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ
धार्मिक कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण के साथ हुआ। इसके पश्चात श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक गुरुदेव को जिनवाणी भेंट की। दिन में श्रद्धालुओं ने स्वाध्याय के माध्यम से आकिंचन्य धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को समझा तथा आत्मचिंतन करते हुए अपने जीवन में ममत्व एवं आसक्ति को कम करने का संकल्प लिया।
शंका-समाधान में जिज्ञासाओं का हुआ समाधान
संध्याकाल में आचार्य श्री के मुखारविंद से शंका-समाधान का आयोजन हुआ। इसमें श्रद्धालुओं ने विभिन्न आध्यात्मिक जिज्ञासाओं एवं धर्म संबंधी प्रश्नों को प्रस्तुत किया, जिनका गुरुदेव ने सरल एवं सारगर्भित तरीके से समाधान किया। इसके पश्चात गुरुदेव की मंगलमय आरती संपन्न हुई।
पूरे नेमी नगर जैन कॉलोनी परिसर में दिनभर भक्तिमय एवं आध्यात्मिक वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने उत्तम आकिंचन्य धर्म के संदेश को आत्मसात करते हुए ‘मेरा-तेरा’ के भाव से ऊपर उठकर आत्मस्वरूप की पहचान और आसक्ति के त्याग का संकल्प लिया।




