आचार्य श्री सुनीलसागर जी ने बताया तप का आध्यात्मिक महत्व, देशभूषण-कुलभूषण महाराज के वैराग्य प्रसंग पर भावपूर्ण नाटिका का मंचन
आचार्य श्री सुनीलसागर जी ने बताया तप का आध्यात्मिक महत्व, देशभूषण-कुलभूषण महाराज के वैराग्य प्रसंग पर भावपूर्ण नाटिका का मंचन

उत्तम तप धर्म की आराधना से गूंजा नेमी नगर, तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति सागर जी के जीवन से मिली साधना की प्रेरणा:
आचार्य श्री सुनीलसागर जी ने बताया तप का आध्यात्मिक महत्व, देशभूषण-कुलभूषण महाराज के वैराग्य प्रसंग पर भावपूर्ण नाटिका का मंचन
नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर। (संवाददाता मुकेश कुमार जैन)।
दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर नेमी नगर जैन कॉलोनी में उत्तम तप धर्म की आराधना श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ की गई। परम पूज्य आचार्य श्री 108 सुनीलसागर जी महाराज के मंगल सान्निध्य में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में श्रद्धालुओं ने तप, त्याग और आत्मशुद्धि का महत्व समझा। गुरुदेव के मंगल प्रवचनों ने धर्मसभा में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को आत्मसाधना के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
कर्मों के पर्वत को मिटाने वाला वज्र है तप
प्रातःकालीन धार्मिक कार्यक्रमों के पश्चात आचार्य श्री सुनीलसागर जी गुरुदेव ने अपने मंगल प्रवचन में उत्तम तप धर्म के वास्तविक स्वरूप एवं उसके आध्यात्मिक महत्व को सरल और प्रेरक उदाहरणों के माध्यम से समझाया।
गुरुदेव ने कहा कि “कर्म रूपी पर्वत को मिटाने के लिए तप वज्र के समान है।” जिस प्रकार वज्र का प्रहार विशाल पर्वत को भी तोड़ सकता है, उसी प्रकार निरंतर तप और साधना से कर्मों के विशाल बंधनों को क्षीण किया जा सकता है। तप केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और कर्म निर्जरा का महत्वपूर्ण साधन है।
उन्होंने कहा कि धूप में चलने के बाद ही छांव की वास्तविक कीमत समझ आती है। इसी प्रकार जीवन में तप और संयम का अनुभव करने पर ही आत्मिक सुख का वास्तविक मूल्य समझ में आता है। तप साधना मनुष्य को आत्मचिंतन, धैर्य और आत्मकल्याण की दिशा में प्रेरित करती है।देशभूषण-कुलभूषण महाराज के वैराग्य प्रसंग ने किया भावविभोर
प्रवचन के दौरान गुरुदेव ने जीवन में शिक्षा और उसके व्यावहारिक आचरण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शिक्षा देने वाले और जीवन जीने की राह दिखाने वाले अनेक लोग मिल जाते हैं, लेकिन उस शिक्षा को अपने जीवन में उतारकर साधना का रूप देने वाले विरले ही होते हैं।इसी प्रेरक संदेश को केंद्र में रखते हुए देशभूषण एवं कुलभूषण महाराज के वैराग्य प्रसंग पर आधारित एक भावपूर्ण नाटिका प्रस्तुत की गई। नाटिका में उनके जीवन में वैराग्य जागरण की प्रेरक घटना को प्रभावशाली ढंग से दर्शाया गया, जिसने उपस्थित श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित किया।
तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति सागर जी का जीवन बना प्रेरणा
गुरुदेव ने तप के जीवंत उदाहरण के रूप में तपस्वी सम्राट आचार्य श्री 108 सन्मति सागर जी महाराज का स्मरण करते हुए उनके कठोर तप, त्याग एवं आत्मसाधना से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख किया।
उन्होंने बताया कि आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज तप के प्रत्यक्ष उदाहरण थे। उनके जीवन में 10 हजार से अधिक उपवासों की साधना का उल्लेख करते हुए गुरुदेव ने बताया कि उन्होंने ब्रह्मचारी अवस्था में ही नमक का त्याग कर दिया था। जीवन के अंतिम लगभग दस वर्षों में अन्न का त्याग कर उन्होंने कठोर तप-साधना की।
उनका तपमय जीवन त्याग, संयम और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। गुरुदेव ने कहा कि उत्तम तप धर्म को केवल सुनने या पढ़ने तक सीमित न रखते हुए उसे अपने जीवन में धारण करना ही इसकी वास्तविक आराधना है।
भक्ति, आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से भक्तिमय हुआ परिसर
सायंकाल भक्तिमय वातावरण में भक्ति गीतों के साथ गुरुदेव की मंगलमय आरती की गई। इसके पश्चात विविध सांस्कृतिक कार्यक्रमों की मनमोहक प्रस्तुतियां हुईं, जिनमें श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
दशलक्षण महापर्व के इस पावन अवसर पर नेमी नगर जैन कॉलोनी का संपूर्ण परिसर दिनभर धर्म, तप, त्याग एवं साधना की प्रेरणामय भावधारा से ओतप्रोत रहा। गुरुदेव के मंगल प्रवचनों और धार्मिक आयोजनों ने श्रद्धालुओं को उत्तम तप धर्म के संदेश को अपने जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा दी।




