‘भावों का खेल है’—आचार्य श्री सुनीलसागर ने बताया आत्मा के उज्ज्वल होने का मार्ग
‘भावों का खेल है’—आचार्य श्री सुनीलसागर ने बताया आत्मा के उज्ज्वल होने का मार्ग

‘भावों का खेल है’—आचार्य श्री सुनीलसागर ने बताया आत्मा के उज्ज्वल होने का मार्ग
निर्मल भाव ही आत्मा को शुद्धि और मुक्ति की दिशा में ले जाते हैं
नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर। (संवाददाता : मुकेश कुमार जैन)
इंदौर। परम पूज्य आचार्य श्री 108 सुनीलसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन में आत्मा की शुद्धि और जीवन की दिशा में भावों की महत्वपूर्ण भूमिका को समझाते हुए कहा कि जैन दर्शन में भावों का विशेष महत्व है। मनुष्य के भीतर जैसे भाव होते हैं, उसी के अनुरूप उसके कर्मों का आश्रव और बंधन होता है। जब तक मन में राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ एवं अन्य कषाय के भाव बने रहते हैं, तब तक कर्मों का आश्रव होता रहता है और संसार का बंधन बना रहता है।
आचार्य श्री ने कहा कि यदि मनुष्य अपने भावों को निर्मल कर ले, तो उसकी आत्मा शुद्धि और मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने लगती है। भाव केवल मन की अनुभूति नहीं, बल्कि आत्मा की दिशा तय करने वाली शक्ति हैं।
उन्होंने रक्षाबंधन पर्व के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि अकम्पनाचार्य मुनिराज सहित 700 मुनिराजों की रक्षा के लिए विष्णुकुमार मुनिराज के भीतर जागा वात्सल्य, करुणा और समर्पण का भाव भावों की अद्भुत शक्ति का उदाहरण है। उनके पवित्र भाव ने उन्हें महान कार्य करने की प्रेरणा दी और यही प्रसंग आज भी भावों की महत्ता का संदेश देता है।
आचार्य श्री ने कहा कि जिनके भाव उज्ज्वल होते हैं, उनकी उज्ज्वलता केवल विचारों में नहीं, बल्कि उनके चेहरे और व्यक्तित्व में भी दिखाई देती है। वहीं जिनके भीतर क्रोध, ईर्ष्या, छल-कपट और कषाय के भाव भरे रहते हैं, उनके व्यक्तित्व पर उसकी छाप दिखाई देने लगती है। बाहरी सुंदरता चाहे कितनी भी हो, लेकिन मन के भाव कलुषित हों तो व्यक्तित्व की वास्तविक चमक फीकी पड़ जाती है।
उन्होंने कहा कि इसलिए जीवन में सच्चा निखार चेहरे का नहीं, बल्कि भावों का होना चाहिए। जब भाव निर्मल होंगे, तब कर्मों का आश्रव रुकने लगेगा और आत्मा संसार के बंधनों से मुक्त होकर परम शुद्धता की दिशा में आगे बढ़ेगी।
आचार्य श्री का संदेश स्पष्ट है कि अपने जीवन को बदलने के लिए सबसे पहले अपने भावों को बदलना होगा। भाव बदलेंगे तो कर्म बदलेंगे, कर्म बदलेंगे तो जीवन की दिशा बदलेगी और आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप की ओर अग्रसर होगी।




