आखिर क्या कारण है कि बदरा जनपद के सीईओ आज भी भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने में नाकामयाब हैं ?
नाक के नीचे भ्रष्टाचार के आरोप, सवालों के घेरे में पंचायत के विकास कार्य; आखिर किसके दबाव में कार्रवाई से पीछे हट रहा जनपद ?


अनूपपुर/बदरा जनपद पंचायत एक बार फिर गंभीर आरोपों और सवालों के घेरे में है। ग्राम पंचायत बदरा में विकास कार्यों के नाम पर किए गए कथित भुगतान, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, पाइपलाइन, सफाई व्यवस्था, सामग्री खरीदी और अन्य मदों में खर्च की गई राशि को लेकर ग्रामीण लगातार सवाल उठा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर उठे इन आरोपों ने अब जनपद पंचायत की कार्यप्रणाली और अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ विकास कार्यों के भुगतान वास्तविक स्थिति और मौके पर हुए काम से मेल नहीं खाते। कहीं पाइपलाइन बिछाने के बाद दोबारा खुदाई का खर्च सामने आया, तो कहीं सफाई के नाम पर भुगतान होने के बावजूद गंदगी की शिकायतें सामने आईं।
निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और मूल्यांकन को लेकर भी ग्रामीणों ने निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है।
सबसे गंभीर सवाल उन भुगतानों को लेकर हैं, जिनमें ग्रामीणों के अनुसार पर्याप्त भौतिक सत्यापन और मूल्यांकन के बिना भुगतान की प्रक्रिया पूरी किए जाने के आरोप हैं। पंचायत के उपलब्ध अभिलेखों में लाखों रुपये के भुगतान का उल्लेख होने की बात सामने आई है। कुछ मामलों में निर्माण सामग्री, कमर्शियल पंप, सबमर्सिबल सेट तथा पाइपलाइन से जुड़े खर्च को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
इसी बीच भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर सामने आई शिकायतों में पंचायत के सरपंच शिवभान सिंह और सचिव सहित संबंधित जिम्मेदारों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं।
आरोपों की वास्तविकता जांच का विषय है
बड़ा सवाल यह है कि जब शिकायतें सार्वजनिक रूप से सामने आ चुकी हैं, तो जनपद स्तर पर अब तक निष्पक्ष जांच समिति गठित करने में इतनी हिचकिचाहट क्यों दिखाई जा रही है?
सत्ता और संगठन के दबाव की चर्चा क्यों ?
मामला केवल एक पंचायत के कथित अनियमित भुगतानों तक सीमित नहीं रह गया है। भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच संबंधित राजनीतिक और संगठनात्मक पदों से जुड़े लोगों के नाम चर्चा में आने से सवाल और गंभीर हो जाते हैं। यदि आरोप निराधार हैं तो निष्पक्ष जांच कर उन्हें तत्काल खारिज किया जाना चाहिए और यदि आरोपों में प्रथमदृष्टया सच्चाई है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन जांच ही नहीं होगी तो सच सामने कैसे आएगा?
जनपद सीईओ की जिम्मेदारी केवल फाइलों पर हस्ताक्षर करने तक सीमित नहीं हो सकती। विकास कार्यों के भुगतान, उनकी गुणवत्ता और मौके पर वास्तविक स्थिति का सत्यापन प्रशासनिक व्यवस्था की बुनियादी जिम्मेदारी है। ऐसे में ग्रामीणों का यह सवाल पूरी तरह जायज है कि आखिर शिकायतों के बावजूद जांच की प्रक्रिया आगे क्यों नहीं बढ़ रही?
अधिकारी मौन, ग्रामीण परेशान—जिम्मेदारी कौन लेगा ?
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि संदिग्ध भुगतानों और विकास कार्यों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तथा दोषियों पर कार्रवाई नहीं की गई तो वे जनपद पंचायत और संबंधित कार्यालयों का घेराव करने को मजबूर होंगे।
अब सवाल सीधे जनपद के जिम्मेदार अधिकारियों से है
क्या सरपंच का कोई दबाव है?
क्या सत्ता या संगठन का दबाव है?
या फिर प्रशासनिक स्तर पर किसी को बचाने की कोशिश हो रही है?
यदि इनमें से कुछ भी नहीं है तो फिर जांच समिति गठित करने में हाथ क्यों रुक रहे हैं?
जनता के पैसों से होने वाले विकास कार्य किसी व्यक्ति, पद या राजनीतिक संरक्षण की जागीर नहीं हो सकते। आरोप सही हैं या गलत, इसका फैसला केवल निष्पक्ष जांच से ही संभव है। इसलिए अब गेंद जनपद सीईओ के पाले में है।
या तो तत्काल निष्पक्ष जांच कराकर दूध का दूध और पानी का पानी किया जाए, या फिर यह सवाल उठता रहेगा कि आखिर बदरा जनपद में कथित भ्रष्टाचार पर कार्रवाई करने से प्रशासन के हाथ किसने बांध रखे हैं?
कौन करेगा कार्रवाई? कौन लेगा जिम्मेदारी? और कब तक जनता के पैसों पर उठते सवालों को नजरअंदाज किया जाएगा?



