लीला से गणिनी आर्यिका आस्था श्री माताजी तक का प्रेरणादायी सफर
लीला से गणिनी आर्यिका आस्था श्री माताजी तक का प्रेरणादायी सफर

लीला से गणिनी आर्यिका आस्था श्री माताजी तक का प्रेरणादायी सफर
माता-पिता और परिवार के संस्कारों व सहयोग से साकार हुआ संयम का मार्ग
सिंगोली, (संवाददाता मुकेश कुमार जैन )मेवाड़ प्रांत। मेवाड़ प्रांत के सिंगोली नगर के जैन श्रावक परिवार कस्तूर चंद–केशर बाई धानोत्या के आंगन में जन्मी बालिका लीला ने मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में सांसारिक मोह-माया से विरक्त होकर संयम के पथ को अपना जीवन लक्ष्य बना लिया। बचपन की लीला से लेकर आज गणिनी आर्यिका आस्था श्री माताजी के रूप में धर्म, तप और आत्मकल्याण की साधना तक की उनकी यात्रा त्याग, तपस्या, संस्कार और दृढ़ संकल्प की प्रेरणादायी गाथा है।
जिस उम्र में बच्चे खेल-कूद, शिक्षा और सांसारिक सुख-सुविधाओं में अपना बचपन बिताते हैं, उसी उम्र में लीला ने आत्मकल्याण की दिशा में कदम बढ़ाते हुए संयम का मार्ग चुना। उनका यह निर्णय असाधारण था, लेकिन इस महान आध्यात्मिक यात्रा को मजबूती देने में माता-पिता और पूरे परिवार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
माता-पिता के संस्कार बने वैराग्य की नींव
लीला के भीतर बचपन से ही मिले धार्मिक संस्कारों ने वैराग्य की भावना को मजबूत किया। जब उन्होंने संयम के मार्ग को अपनाने का संकल्प लिया, तब परिवार ने उनके निर्णय को समझा और आध्यात्मिक भावना का सम्मान करते हुए पूरा सहयोग प्रदान किया। माता-पिता द्वारा दिए गए संस्कार और परिवार के स्नेहपूर्ण सहयोग ने उनके संकल्प को और दृढ़ बनाया।
परिवार का यह त्याग भी अपने आप में अनुकरणीय रहा। बेटी को सांसारिक जीवन में रोकने के बजाय उसके आत्मिक उत्थान की भावना को स्वीकार करना और संयम की राह पर आगे बढ़ने के लिए उसका साथ देना, परिवार के उच्च संस्कारों और धार्मिक आस्था का परिचायक है।
सिंगोली की बेटी बनीं धर्म की प्रेरणास्रोत
सिंगोली नगर के लिए यह गौरव का विषय है कि इस पावन भूमि पर जन्मी बेटी आज गणिनी आर्यिका आस्था श्री माताजी के रूप में धर्म, संयम, तप और आत्मकल्याण का संदेश जन-जन तक पहुंचा रही हैं।
उनका जीवन यह संदेश देता है कि उम्र बड़ी उपलब्धियों के लिए बाधा नहीं होती। यदि संस्कार मजबूत हों, वैराग्य की भावना जागृत हो और संकल्प दृढ़ हो, तो छोटी-सी उम्र में भी मनुष्य अपने जीवन की महान दिशा निर्धारित कर सकता है।
लीला से आस्था श्री माताजी बनने तक की यह यात्रा केवल एक बालिका के सांसारिक त्याग की कहानी नहीं है, बल्कि यह माता-पिता के संस्कार, परिवार के सहयोग, आत्मिक जागरण और दृढ़ संकल्प की प्रेरणादायी गाथा है।
आज श्रद्धालु गणिनी आर्यिका आस्था श्री माताजी के संयम, तप और त्यागमय जीवन से प्रेरणा लेते हुए उनके चरणों में श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि सच्चा गौरव केवल सांसारिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और धर्म के मार्ग पर चलने में है।
सिंगोली की बेटी से धर्म की प्रेरणास्रोत बनीं गणिनी आर्यिका आस्था श्री माताजी—यह केवल धानोत्या परिवार की गौरवगाथा नहीं, बल्कि सिंगोली नगर और पूरे मेवाड़ प्रांत के लिए भी गौरव और प्रेरणा का विषय है।




